सोचना हो, बोलना हो, समझना हो, लिखना हो, तो कृष्ण से ज्यादा महत्वपूर्ण
वयक्ति खोजना मुश्किल है I ऐसा नहीं कि और महत्वपूर्ण वयक्ति नहीं हुए हैं I
ऐसा भी नहीं है कि और महत्वपूर्ण वयक्ति नहीं होंगे, लेकिन कृष्ण का महत्व
अतीत के लिए कम भविष्य के लिए ज्यादा है I सच ऐसा है कि कृष्ण अपने समय से
कम से कम पांच हजार वर्ष पहले पैदा हुए I सभी महत्वपूर्ण वयक्ति अपने समय
से पहले पैदा होते हैं, और सभी गैर-
महत्वपूर्ण वयक्ति अपने समय के बाद पैदा होते है. बस महत्वपूर्ण और गैर-
महत्वपूर्ण वयक्ति में इतना ही फर्क है. और सभी साधारण वयक्ति अपने समय पर
पैदा होते हैं I
कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है I अनूठेपन की पहली
बात तो ये है कि कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के I मनुष्य अभी
भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके I अभी भी कृष्ण
मनुष्य की समझ से बाहर हैं I भविष्य में ही यह संभव हो पायेगा कि कृष्ण को
हम समझ पायें I
इसका सबसे बड़ा कारण तो यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे
व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और उंचाईयों पर होकर भी गंभीर नहीं
हैं, उदास नहीं हैं, रोते नहीं हैं I साधारणतः संत का लक्षण ही रोता हुआ
होना है I जिंदगी से उदास, हरा हुआ, भागा हुआ I कृष्ण अकेले ही नाचते हुए
व्यक्ति हैं I हँसते हुए, गीत गाते हुए I जीसस के संबंध में कहा जाता है कि
वह कभी हँसे नहीं I शायद जीसस का यह उदास वयक्तिव और सूली पर लटका हुआ
उनका शरीर ही हम दुखी–चित लोगों को बहुत आकर्षण का कारण बन गया I महावीर और
बुद्ध भी बहुत गहरे अर्थों में जीवन के विरोधी हैं I कोई और जीवन है परलोक
में, कोई मोक्ष है, उसके पक्षपाती है I समस्त धर्मो ने दो हिस्से कर रखे
हैं जीवन के – एक वह जो स्वीकार योग्य है और एक वह जो इनकार के योग्य है I
कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं I इसलिए, इस
देश ने सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है.
राम भी अंश ही हैं परमात्मा के, लेकिन कृष्ण पुरे ही परमात्मा हैं. यह कहने
का कारण है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया है I
अलबर्ट श्वीत्जर
ने भारतीय धर्म की आलोचना में एक बड़ी कीमत की बात कही है, और वह यह है कि
भारत का धर्म जीवन-निषेधक, ‘लाइफ निगेटिव’ है यह बात बहुत दूर तक सच है,
यदि कृष्ण को भुला दिया जाये I और यदि कृष्ण को भी विचार में लिया जाये तो
यह बात एकदम ही गलत हो जाती है I और श्वीत्जर यदि कृष्ण को समझते तो ऐसी
बात न कह पाते I लेकिन कृष्ण का कोई व्यापक छाया भी हमारे चित्त पर नहीं
पड़ी I वे अकेले दुःख के एक महासागर में नाचते हुए एक छोटे से द्वीप हैं I
या ऐसा हम समझें कि उदास और निषेध और दमन और निंदा के बड़े मरुस्थल में एक
बहुत छोटे- से नाचते हुए मरूदन हैं I वह हमारे पुरे जीवन की धारा को नहीं
प्रभावित कर पाए I हम ही इस योग्य न थे, हम उन्हें आत्मसात न कर पाए I शायद
आनेवाले भविष्य में हम कृष्ण को समझने में योग्य हो सकेंगे. अतीत कृष्ण को
समझने में योग्य नहीं हो सके I
जिसे हम नहीं समझ पाते उसे हम भगवान
कहना शुरू कर देते हैं, उसकी पूजा शुरू हो जाती है I भगवान कहने का मतलब है
कि जैसे हम भगवान को नहीं समझ पा रहे हैं वैसे ही इस वयक्ति को नहीं समझ
पा रहे हैं I जैसे भगवान सदा ही जानने को शेष रह जाता है वैसे ही कृष्ण भी
शदियों से जानने- समझने के लिए शेष रह गए हैं I
लेकिन अब वक्त करीब आ रहा है जब कृष्ण की पूजा से अर्थ नहीं होगा, कृष्ण को जीना शुरू हो सकेगा I
बुद्ध ने कहा है, जन्म दुःख है,जीवन दुःख है, जरा दुःख है, मृत्यु दुःख
है, ये सब दुःख है I दुःख अब मिटाए जा सकेंगे I जन्म दुःख नहीं होगी- न माँ
के लिए न बेटे के लिए I जीवन दुःख नहीं होगा, बीमारियाँ समाप्त की जा
सकेंगी I जरा नहीं होगी और बुढ़ापे से आदमी को जल्दी ही बचा लिया जायेगा और
जीवन को भी लंबा किया जा सकता है I तब विचारणीय यह नहीं होगा कि आदमी क्यूँ
मर जाता है, विचारणीय यह होगा कि आदमी इतना लंबा क्यूँ जिए I उस दिन बुद्ध
का वचन – जन्म दुःख है, मृत्यु दुःख है, बहुत समझना मुश्किल हो जायेगा I
उस दिन कृष्ण की बांसुरी, कृष्ण के गीत और कृष्ण का नृत्य सार्थक हो सकेगा I
तब जीवन सुख है, इसके फूल चारो तरफ खिल जायेंगे I इन फूलों के बीच में
नग्न खड़े हुए महावीर का संदर्भ खो सा जायेगा I इन फूलों के बीच में जीवन के
प्रति पीठ करके जानेवाले वयक्तित्व का अर्थ खो जायेगा I भविष्य में दुःख
कम होता जायेगा और सुख बढ़ता जायेगा, इसलिए मैं सोचता हूँ कि कृष्ण की
उपयोगिता रोज रोज बढती जानेवाली है I