बुधवार, 25 सितंबर 2013

हमारे ही समाज में सेक्स की इतनी विकृतियां क्यों हैं?


कहर है कि थमता ही नहीं। अब तो खबरें देखने-पढ़ने से डर लगने लगा है। सुबह उठ कर न जाने क्या देखने को मिले। सेक्स को लेकर एक से एक वहशी नमूने सामने आने लगे हैं। कभी-कभी लगता है इतनी घिनौनी बातें आदमी सोच भी कैसे पाता है। कैसा होगा वह दिमाग जो काम के प्रति इतना बदसूरत रवैया रखता है। और हम आक्रोश व्यक्त करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

सेक्स के दमन के जो भीषण परिणाम हुए हैं, ओशो ने उनकी खुलकर चर्चा की। तो बजाय इसके कि उनके विश्लेषण को समझा जाए, उसे आंखें खोल कर देखा जाए- ओशो पर ही सेक्स गुरु की मुहर लग गई। लेकिन सच को कितना ही नकारें, उसे झुठला तो नहीं सकते। उल्टे और भी ताकत समेट कर कई गुना ज्यादा शक्ति के साथ वह फट पड़ता है। और जब दमित सत्य विस्फोटित होता है, तो ऐसी शक्ल में कि पहचानना मुश्किल होता है। स्वाभाविक सेक्स को नकारने से यहां लोगों ने अस्वाभाविक दरवाजे ढूंढने शुरू कर दिए हैं। वे ऊपर से सज्जन बने रहते हैं, पर भीतर से दरिंदे हो रहे हैं।

डार्विन के सिद्धांत के बाद यह माना जाने लगा कि बंदर मनुष्य के पूर्वज हैं। ओशो ने व्यंग्य करते हुए कहा, पहले बंदर से तो पूछो कि उसे मनुष्य का पूर्वज बनना स्वीकार है कि नहीं? यह तो आप ही मानकर बैठे हैं कि हम बंदर के वंशज हैं। लेकिन ये वंशज जिस तरह छोटी-छोटी लड़कियों पर बलात्कार कर रहे हैं, उन्हें देख कर तो बंदर ही नहीं, कोई भी पशु शर्मिंदा हो जाएगा।

सेक्स के दमन से भारत ने क्या पाया है? पहले तो एड्स, दूसरा बेतहाशा बढ़ी हुई आबादी, तीसरे पाखंडी नैतिकता और उसी नैतिकता के तहत होने वाली घरेलू हिंसाएं। लड़की की घटती हुई जन्म दर और दम तोड़ती हुई विवाह संस्था। ओशो ने जब कहा कि सभी अनैतिक काम संबंध या वेश्यावृत्ति गलत विवाह का परिणाम हैं- तो बड़ा बुरा लगा सबको। फिर जिसे भी वह सीधे रास्ते नहीं मिला, वह गलत रास्ते से हासिल करने की कोशिश करने लगा और अराजक हो गया, जानवर बन गया। आश्चर्य है कि सेक्स की सारी समस्याएं पुरुष की होती हैं, स्त्री की कोई समस्या नहीं है।

महाशक्ति बनने का दम भरने वाले इस देश में जब तक स्त्री-पुरुष संबंधों का सही ताना-बाना नहीं बुना जाएगा, उसे बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाएगा, तब तक पुरुष का यह विकृत चेहरा सिर उठाता रहेगा। जिस समाज में कन्या को पैदा होने से पहले मार दिया जाता हो, स्त्री को भोग्य वस्तु के रूप में देखा जाता हो, वहां स्त्री के साथ बर्बरता को 'मर्दानगी' की निशानी समझा जाता रहेगा। इस बीमारी को जड़ से उखाड़ने की जरूरत है। निर्भया मामले के बाद नए कानून बनाए गए, महिला सुरक्षा के उपाय कसे गए, पर क्या इन पाशविक विकृतियों पर रोक के लिए कोई समाधान ढूंढा गया?
मनुष्य में विकृति अपने आप जन्म नहीं लेती। मर्दानगी की एकांगी संकल्पना पुष्ट करने में पारिवारिक संस्था, धर्म, स्वास्थ्य, शिक्षा और कानून की भी भूमिका होती है। आजकल मीडिया में हो जारी अमीरी की चकाचौंध और देह प्रदर्शन के चलन ने माहौल को और जटिल बना दिया है। समाज में जब तक गैर बराबरी का आलम रहेगा, भयंकर आर्थिक विषमता होगी, दकियानूसी सोच को सींचने का काम होता रहेगा, तब तक विकृतियां पनपती रहेंगी।

जिस परिवार में पिता अपनी पत्नी यानी बच्चे की मां के साथ बेरहम सलूक करता है, उसका बच्चा बड़ा होकर महिलाओं के साथ अत्याचार करने में झिझकता नहीं। स्त्री-पुरुष के बीच समानता के बीज बोने के लिहाज से स्कूल और परिवार से ज्यादा सही जगह कोई नहीं हो सकती। इसके अलावा पुरुषत्व की व्याख्या बदलना भी आवश्यक है। रेप मामले पर सरकार और व्यवस्था को कोसने से पहले हमें खुद से सवाल करने चाहिए कि कोई पुरुष हैवानी पर क्यों उतारू हो जाता है?

ऐसे कुकर्म करने वालों को पछतावा क्यों नहीं होता? कठोर सजा होने का खौफ उन्हें क्यों नहीं है? निर्भया के समय देश में कितना हड़कंप मचा था। क्या उन बलात्कारियों को सजा का कोई भय नहीं था? जवाब में कई 'शायद' सामने होते हैं- शायद उन्हें हमारी निकम्मी व्यवस्था, ढीली न्यायपालिका, भ्रष्ट पुलिस और खुदगर्ज नेताओं पर ज्यादा भरोसा है। शायद वे जानते हैं कि अरुणा शानबाग के साथ बलात्कार करने वाला सात साल की जेल काटकर रिहा हो गया है। उसके जैसे कई बलात्कारी समाज में बेरोकटोक घूम रहे हैं। अब वक्त बहसें झाड़ने का नहीं, बलात्कारियों और विकृतियों से सीधे निपटने का है।

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